| به چشمان پريرويان اين شهر |
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به صد اميد ميبستم نگاهي |
| مگر يك تن از اين نا آشنايان |
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مرا بخشد به شهر عشق راهي |
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| به هر چشمي -به اميدي كه اين اوست- |
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نگاه بيقرارم خيره ميماند |
| يكي هم ، زين همه نا آشنايان |
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اميدم را به چشمانم نميخواند! |
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| غريبي بودم و گم كرده راهي |
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مرا با خود به هر سويي كشاندند |
| شنيدم.. بارها.. از رهگذاران |
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كه زير لب مرا "ديوانه" خواندند |
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| ولي من چشم اميدم نميخفت |
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كه مرغي آشيان گم كرده بودم |
| ز هر بام و دري... سر مي كشيدم |
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به هر بوم و پري... پر ميگشودم |
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| اميد خستهام از پاي ننشست |
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نگاه تشنهام در جستجو بود |
| در آن هنگامهي ديدار و پرهيز |
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رسيدم عاقبت... آنجا كه او بود |
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| " دو سرگردان ، دو تنها و دو بيكس " |
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ز خود بيگانه ، از هستي رميده |
| از اين بيدرد مردم ، رو نهفته |
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شرنگ نااميدي ها چشيده |
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| دل از بي هم زبانيها شكسته ؛ |
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تن از نامهربانيها فسرده ؛ |
| ز حسرت.. پاي در دامن كشيده |
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به خلوت.. سر به زير بال برده. |
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| دو تنها و دو سرگردان ، دو بيكس |
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به خلوتگاه "جان" با هم نشستند |
| زبان "بيزباني" را گشودند |
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سكوت جاوداني را شكستند... |
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| مپرسيد.. اي سبكباران... مپرسيد |
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كه اين ديوانهي از خود به در كيست |
| چه گويم؟ از كه گويم؟ با كه گويم؟ |
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كه اين ديوانه را از خود خبر نيست... |
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| به آن لب تشنه ميمانم كه ناگاه |
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به دريايي درافتد بيكرانه |
| لبي ، از قطره آبي ، تر نكرده |
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خورد از موج وحشي تازيانه |
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| مپرسيد.. اي سبكباران... مپرسيد |
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مرا با عشق او تنها گذاريد... |
| غريق لطف آن دريا نگاهم ؛ |
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مرا تنها به اين دريا سپاريد!! |