فلسفه چيست؟
تاريخ موجوديتي آفاقي / برون ذات ((objective كه مستقل از انسان باشد ندارد. تاريخ پديدهاي سابژكتيو است. بنابراين تاريخ چيزي نيست جز طرحهاي ما از تاريخ. چيزي به نام تاريخ در بيرون از ذهن ما به عنوان يك جريان و روند مستقل از آدمي وجود ندارد. آنچه در خارج وجود دارد مجموعهاي از رويدادهاي متكثر و متنوع است كه در زمانها و مكانهاي متفاوتي روي دادهاند. تاريخ را ما ميسازيم به دو معني: نخست به عنوان كنشگر تاريخي فهم ويژهاي از موقعيت خود داريم و با مقصود معيني دست به كنش ميزنيم و دوم به عنوان روايتگر تاريخ آن را بازسازي ذهني ميكنيم. در اين معناي اخير، تاريخ عبارت است از روايتهايي كه ما از تاريخ داريم و اين روايتها نيز بر درك خاصي از زمان استوار است. به همين دليل هم هست كه تاريخ در زندگي بشر پديدهاي متاخر است و مربوط ميشود به زماني كه بشر درك دوري از زمان را وانهاد.
جان فشان اي آفتاب معنوي
|
اي كه به هنگام درد راحت جاني مرا
|
اي كه به تلخي فقر گنج رواني مرا
|
|
آنچه نبردست وهم، آنچه نديدهاست فهم
|
از تو به جان ميرسد، قبلهي آني مرا
|
|
توانا بود هر كه دانا بود
|
به دانش دل پير برنا بود
|
|
پيش ما سوختگان مسجد و ميخانه يكـيست
|
حرم و دير يكي، سبحه و پيمانه يكيست
|
|
اينهمه جنگ و جدل حاصل كوتهنظري است
|
گر نظر پاك كني كعبه و بتخانه يكيست
|
|
هر كسي قصهي شوقش به زباني گويد
|
چون نكو مينگرم حاصل افسانه يكيست
|
|
اينهمه قصه ز سوداي گرفتاران است
|
ور نه از روز ازل دام يكي،دانه يكيست
|
|
رهي هركس به فسوني زده آن شوخ ار نه
|
گريهي نيمه شب و خندهي مستانه يكيست
|
|
گر زمن پرسي از آن لطف كه من ميدانم
|
آشنا بر در اين خانه و بيگانه يكيست
|
|
هيچ غم نيست كه نسبت به جنونم دادند
|
بهر اين يك دو نفس عاقل و ديوانه يكيست
|
|
عشق آتش بود و خانه خرابي دارد
|
پيش آتش دل شمع و پر پروانه يكيست
|
|
گر به سر حد جنونت ببرد عشق«عماد»
|
بيوفـايي و وفاداري جانانه يكيست
|
|
1
|
حبيب ايراني
|
|
|
2
|
ابراهيم ادهم
|
|
|
3
|
رابعه عدويه
|
|
|
4
|
فضيل عياض
|
|
|
5
|
ابوتراب نخشبي
|
|
|
6
|
معروف كرخي
|
200 هجري
|
|
7
|
ابوعلي شفيق بلخي
|
|
|
8
|
حاتم(عصم) اصم
|
249هجري
|
|
9
|
بشر حافي
|
227 هجري
|
|
10
|
بايزيد بسطامي
|
|
|
1
|
ابوعبدالله مغربي خليفه بايزيد
|
|
|
2
|
ابوالحسين نوري
|
279 يا 286 هجري
|
|
3
|
يحييبن معاذ بلخي
|
|
|
4
|
احمد خضرويه بلخي
|
234 يا 240 هجري
|
|
5
|
داود بلخي
|
|
|
6
|
سهل تستري(شوشتري)
|
273 يا 283 هجري
|
|
7
|
جنيد نهاوندي(بغدادي)
|
|
|
8
|
حمدون قصار
|
271 هجري
|
|
9
|
ابوحمزهي خراساني
|
290 هجري
|
|
10
|
حسين منصور حلاج
|
244 هجري
|
|
11
|
ابوبكر شبلي خراساني
|
|
|
12
|
ابويعقوب كورتي
|
|
|
13
|
ابومحمد مرتعش نيشابوري
|
328 هجري
|
|
14
|
ابونصر سراج طوسي
|
|
|
15
|
ابوالعباس قصاب آملي
|
|
|
16
|
محمد بن خفيف
|
|
|
17
|
ابوعبدالرحمن سلمي نيشابوري
|
325 هجري
|
|
18
|
شيخ ابوالحسن خرقاني
|
|
|
19
|
علي عبدالله محمد بن باكو (بابا كوهي شيرازي)
|
|
|
20
|
شيخ حسن سكاك سمناني
|
|
|
21
|
شيخ ابواسحاق كازروني
|
|
|
22
|
ابوسعيد ابوالخير
|
|
|
23
|
ابوالقاسم قشيري نيشابوري
|
|
|
24
|
بابا طاهر همداني
|
|
|
25
|
ابوالحسن هجويري جلابي
|
|
|
26
|
شيخ ابوعلي فضل بن محمد فارمدي(فريومدي)
|
477 هجري
|
|
27
|
شيخ احمد جام (ژنده پيل)
|
|
|
28
|
ابوحامد محمد غزالي طوسي
|
|
|
29
|
خواجه عبدالله انصاري
|
|
|
30
|
سنايي
|
|
|
31
|
خواجه ابويعقوب يوسف همداني
|
|
|
32
|
شيخ احمد غزالي طوسي
|
535 هجري
|
|
33
|
عينالقضاه همداني
|
|
|
34
|
شيخ عبدالقادر گيلاني
|
471 هجري
|
|
35
|
محمدبن منور
|
|
|
36
|
شيخ روزبهان بقلي
|
|
|
37
|
شهاب الدين يحيي سهروردي "شيخ اشراق"
|
|
|
38
|
شيخ نجمالدين كبري
|
|
|
39
|
خواجه عبدالخالق غجدواني
|
|
|
40
|
شيخ عطار نيشابوري
|
|
|
41
|
شيخ شهابالدين عمر سهروردي
|
|
|
42
|
|
|
|
43
|
مجدالدين بغدادي
|
|
|
44
|
اوحدالدين كرماني
|
|
|
45
|
رضيالدين علي لالا غزنوي
|
|
|
46
|
شمس تبريزي
|
|
|
47
|
سعدالدين محمد حموي
|
|
|
48
|
شمس الدين احمد افلاكي
|
|
|
49
|
شيخ نجم الدين رازي
|
|
|
50
|
سيفالدين باخرزي
|
|
|
51
|
شيخ بهاءالدين ولد
|
|
|
52
|
سيد برهانالدين محقق
|
|
|
53
|
شيخ جمالالدين احمد جوزجاني
|
|
|
54
|
عزيزالدين نسفي(ننخشبي)
|
|
|
55
|
مولانا جلال الدين محمد بلخي (مولوي)
|
|
|
56
|
شيخ صدرالدين قونيوي
|
|
|
57
|
نجيبالدين عليبن بزغش شيرازي
|
|
|
58
|
اوحدالدين بلياني
|
|
|
59
|
فخرالدين عراقي همداني
|
|
|
60
|
شيخ محمود شبستري
|
|
|
61
|
مير حسين سادات هروي
|
|
|
62
|
خواجه علي راميثني
|
|
|
63
|
نجمالدين زركوب
|
|
|
64
|
پهلوان محمود قتالي خوارزمي
|
|
|
65
|
سيفالدين صوفي
|
|
|
66
|
بابا افضل كاشاني
|
|
|
67
|
كمال خجندي
|
|
|
68
|
صفيالدين اردبيلي
|
|
|
69
|
شيخ علاءالدولهي سمناني
|
|
|
70
|
كمالالدين عبدالرزاق كاشاني
|
|
|
71
|
شيخ تقيالدين علي دوستي سمناني
|
|
|
72
|
اخي محمد دهستاني
|
|
|
73
|
شيخ محمود مزدقاني
|
|
|
74
|
مير سيد علي همداني
|
|
|
75
|
اوحدالدين مراغهاي
|
|
|
76
|
قطبالدين يحيي جامي نيشابوري
|
|
|
77
|
زينالدين ابوبكر تائبآبادي
|
|
|
78
|
خواجه بهاءالدين نقشبند
|
|
|
79
|
ظهيرالدين خلوتي
|
|
|
80
|
حافظ
|
|
|
81
|
شيخ كجج تبريزي
|
قرن هشتم هجري
|
|
82
|
علاءالدين عطار
|
قرن هشتم هجري
|
|
83
|
قطبالدين عبدالكريم گيلاني
|
قرن هشتم و نهم هجري
|
|
84
|
شمسالدين محمد مغربي
|
قرن هشتم هجري
|
|
85
|
شاه نعمتالله ولي كرماني
|
قرن هشتم هجري
|
|
86
|
امير قوامالدين سنجاني(خوافي)
|
قرن هشتم و اوايل نهم هجري
|
|
87
|
زينالدين ابوبكر علي تايبادي
|
|
|
88
|
خواجه ابوالفتح محمد پارسا
|
قرن هشتم هجري
|
|
89
|
خواجه حسن عطار
|
|
|
90
|
شيخ ابوالوفاي خوارزمي
|
اوايل نهم هجري
|
|
91
|
سيد قاسم انوار
|
|
|
92
|
شيخ زيـنالدين خوافي
|
|
|
93
|
شيخ كمالالدين حسين كاشاني
|
|
|
94
|
يعقوب بن عثمان چرخي غزنوي
|
|
|
95
|
خواجه سعدالدين كاشغري
|
|
|
96
|
مولانا جلالالدين پوراني
|
|
|
97
|
خواجه شمسالدين محمد كوسوي
|
|
|
98
|
مولانا شمسالدين محمد اسد
|
قرن نهم هجري
|
|
99
|
مولانا نظامالدين خاموش
|
|
|
100
|
خواجه حافظالدين ابونصر پارسا
|
|
|
101
|
شاه داعي شيرازي
|
قرن نهم هجري
|
|
102
|
سيد محمد نور بخش
|
|
|
103
|
شيخ بهاءالدين عمر
|
|
|
104
|
جمال الدين فضل الله احمد پير جمالي اردستاني
|
قرن نهم هجري
|
|
105
|
خواجه ناصرالدين عبيدالله احرار
|
|
|
106
|
عبدالله قطب (قطب محيي)
|
|
|
107
|
نور الدين عبدالرحمن جامي
|
|
|
108
|
بديعالدين يا رضيالدين عبدالغفور لاري
|
|
|
109
|
خواجه ابواسحق ختلاني
|
|
|
110
|
امير سيد شهابالدين عبدالله برزشآبادي
|
|
|
111
|
شيخ رشيدالدين محمد بيداوازي
|
|
|
112
|
شاه شيخ علي اسفرائني
|
|
|
113
|
شيخ غلامعلي نيشابوري
|
|
|
114
|
شيخ عمادالدين فضلالله مشهدي
|
|
|
115
|
شيخ تاجالدين حسين تبادكاني خوارزمي
|
|
|
116
|
درويش محمد كارندهي
|
|
|
117
|
شيخ حاتم زراوندي خراساني
|
|
|
118
|
شيخ محمد علي مؤذن سبزواري
|
|
|
119
|
شيخ نجيبالدين رضا تبريزي اصفهاني
|
|
|
120
|
سرمد كاشاني
|
|
|
121
|
ملامحمد صوفي مازندراني
|
|
|
122
|
درويش محمد صالح لبناني
|
|
|
123
|
قاضي اسد كاشاني
|
|
|
124
|
شيخ علينقي اصطهباناتي
|
|
|
125
|
سيد قطب الدين محمد نيريزي شيرازي
|
|
|
126
|
ملا محمد اسماعيل كامل خراساني
|
|
|
127
|
آقامحمد هاشم درويش شيرازي
|
|
|
128
|
سيد عبدالنبي شيرازي (سلطان المشايخ)
|
|
|
129
|
سيد ابوالقاسم شريفي شيرازي(آقا ميرزابابا)
|
|
|
130
|
ميرزا احمد عبدالحي مرتضي تبريزي(وحيدالولياء)
|
|
|
131
|
درويش حسينعلي اصفهاني(كابلي)
|
|
|
132
|
رونق عليشاه كرماني
|
|
|
133
|
نظامعلي كرماني
|
نيمه اول قرن سيزدهم هجري
|
|
134
|
حسينعلي شاه اصفهاني
|
قرن سيزدهم هجري
|
|
135
|
شيخ زاهد گيلاني(ثاني)
|
|
|
136
|
مشتاقعليشاه تريتي
|
|
|
137
|
مظفر عليشاه كرماني
|
|
|
138
|
فيضعليشاه طبسي
|
|
|
139
|
نورعليشاه اصفهاني
|
قرن سيزدهم هجري
|
|
140
|
ملاعبدالصمد همداني
|
|
|
141
|
حاج زينالعابدين شيرواني(مستعليشاه)
|
|
|
142
|
رحمت عليشاه
|
|
|
143
|
سعادت عليشاه«طاووس العرفا»
|
|
|
144
|
نور عليشاه گنابادي
|
|
|
145
|
شمسالعرفا تهراني
|
|
1
|
حبيب ايراني
|
|
|
2
|
ابراهيم ادهم
|
|
|
3
|
رابعه عدويه
|
|
|
4
|
فضيل عياض
|
|
|
5
|
ابوتراب نخشبي
|
|
|
6
|
معروف كرخي
|
200 هجري
|
|
7
|
ابوعلي شفيق بلخي
|
|
|
8
|
حاتم(عصم) اصم
|
249هجري
|
|
9
|
بشر حافي
|
227 هجري
|
|
10
|
بايزيد بسطامي
|
|
|
1
|
ابوعبدالله مغربي خليفه بايزيد
|
|
|
2
|
ابوالحسين نوري
|
279 يا 286 هجري
|
|
3
|
يحييبن معاذ بلخي
|
|
|
4
|
احمد خضرويه بلخي
|
234 يا 240 هجري
|
|
5
|
داود بلخي
|
|
|
6
|
سهل تستري(شوشتري)
|
273 يا 283 هجري
|
|
7
|
جنيد نهاوندي(بغدادي)
|
|
|
8
|
حمدون قصار
|
271 هجري
|
|
9
|
ابوحمزهي خراساني
|
290 هجري
|
|
10
|
حسين منصور حلاج
|
244 هجري
|
|
11
|
ابوبكر شبلي خراساني
|
|
|
12
|
ابويعقوب كورتي
|
|
|
13
|
ابومحمد مرتعش نيشابوري
|
328 هجري
|
|
14
|
ابونصر سراج طوسي
|
|
|
15
|
ابوالعباس قصاب آملي
|
|
|
16
|
محمد بن خفيف
|
|
|
17
|
ابوعبدالرحمن سلمي نيشابوري
|
325 هجري
|
|
18
|
شيخ ابوالحسن خرقاني
|
|
|
19
|
علي عبدالله محمد بن باكو (بابا كوهي شيرازي)
|
|
|
20
|
شيخ حسن سكاك سمناني
|
|
|
21
|
شيخ ابواسحاق كازروني
|
|
|
22
|
ابوسعيد ابوالخير
|
|
|
23
|
ابوالقاسم قشيري نيشابوري
|
|
|
24
|
بابا طاهر همداني
|
|
|
25
|
ابوالحسن هجويري جلابي
|
|
|
26
|
شيخ ابوعلي فضل بن محمد فارمدي(فريومدي)
|
477 هجري
|
|
27
|
شيخ احمد جام (ژنده پيل)
|
|
|
28
|
ابوحامد محمد غزالي طوسي
|
|
|
29
|
خواجه عبدالله انصاري
|
|
|
30
|
سنايي
|
|
|
31
|
خواجه ابويعقوب يوسف همداني
|
|
|
32
|
شيخ احمد غزالي طوسي
|
535 هجري
|
|
33
|
عينالقضاه همداني
|
|
|
34
|
شيخ عبدالقادر گيلاني
|
471 هجري
|
|
35
|
محمدبن منور
|
|
|
36
|
شيخ روزبهان بقلي
|
|
|
37
|
شهاب الدين يحيي سهروردي "شيخ اشراق"
|
|
|
38
|
شيخ نجمالدين كبري
|
|
|
39
|
خواجه عبدالخالق غجدواني
|
|
|
40
|
شيخ عطار نيشابوري
|
|
|
41
|
شيخ شهابالدين عمر سهروردي
|
|
|
42
|
|
|
|
43
|
مجدالدين بغدادي
|
|
|
44
|
اوحدالدين كرماني
|
|
|
45
|
رضيالدين علي لالا غزنوي
|
|
|
46
|
شمس تبريزي
|
|
|
47
|
سعدالدين محمد حموي
|
|
|
48
|
شمس الدين احمد افلاكي
|
|
|
49
|
شيخ نجم الدين رازي
|
|
|
50
|
سيفالدين باخرزي
|
|
|
51
|
شيخ بهاءالدين ولد
|
|
|
52
|
سيد برهانالدين محقق
|
|
|
53
|
شيخ جمالالدين احمد جوزجاني
|
|
|
54
|
عزيزالدين نسفي(ننخشبي)
|
|
|
55
|
مولانا جلال الدين محمد بلخي (مولوي)
|
|
|
56
|
شيخ صدرالدين قونيوي
|
|
|
57
|
نجيبالدين عليبن بزغش شيرازي
|
|
|
58
|
اوحدالدين بلياني
|
|
|
59
|
فخرالدين عراقي همداني
|
|
|
60
|
شيخ محمود شبستري
|
|
|
61
|
مير حسين سادات هروي
|
|
|
62
|
خواجه علي راميثني
|
|
|
63
|
نجمالدين زركوب
|
|
|
64
|
پهلوان محمود قتالي خوارزمي
|
|
|
65
|
سيفالدين صوفي
|
|
|
66
|
بابا افضل كاشاني
|
|
|
67
|
كمال خجندي
|
|
|
68
|
صفيالدين اردبيلي
|
|
|
69
|
شيخ علاءالدولهي سمناني
|
|
|
70
|
كمالالدين عبدالرزاق كاشاني
|
|
|
71
|
شيخ تقيالدين علي دوستي سمناني
|
|
|
72
|
اخي محمد دهستاني
|
|
|
73
|
شيخ محمود مزدقاني
|
|
|
74
|
مير سيد علي همداني
|
|
|
75
|
اوحدالدين مراغهاي
|
|
|
76
|
قطبالدين يحيي جامي نيشابوري
|
|
|
77
|
زينالدين ابوبكر تائبآبادي
|
|
|
78
|
خواجه بهاءالدين نقشبند
|
|
|
79
|
ظهيرالدين خلوتي
|
|
|
80
|
حافظ
|
|
|
81
|
شيخ كجج تبريزي
|
قرن هشتم هجري
|
|
82
|
علاءالدين عطار
|
قرن هشتم هجري
|
|
83
|
قطبالدين عبدالكريم گيلاني
|
قرن هشتم و نهم هجري
|
|
84
|
شمسالدين محمد مغربي
|
قرن هشتم هجري
|
|
85
|
شاه نعمتالله ولي كرماني
|
قرن هشتم هجري
|
|
86
|
امير قوامالدين سنجاني(خوافي)
|
قرن هشتم و اوايل نهم هجري
|
|
87
|
زينالدين ابوبكر علي تايبادي
|
|
|
88
|
خواجه ابوالفتح محمد پارسا
|
قرن هشتم هجري
|
|
89
|
خواجه حسن عطار
|
|
|
90
|
شيخ ابوالوفاي خوارزمي
|
اوايل نهم هجري
|
|
91
|
سيد قاسم انوار
|
|
|
92
|
شيخ زيـنالدين خوافي
|
|
|
93
|
شيخ كمالالدين حسين كاشاني
|
|
|
94
|
يعقوب بن عثمان چرخي غزنوي
|
|
|
95
|
خواجه سعدالدين كاشغري
|
|
|
96
|
مولانا جلالالدين پوراني
|
|
|
97
|
خواجه شمسالدين محمد كوسوي
|
|
|
98
|
مولانا شمسالدين محمد اسد
|
قرن نهم هجري
|
|
99
|
مولانا نظامالدين خاموش
|
|
|
100
|
خواجه حافظالدين ابونصر پارسا
|
|
|
101
|
شاه داعي شيرازي
|
قرن نهم هجري
|
|
102
|
سيد محمد نور بخش
|
|
|
103
|
شيخ بهاءالدين عمر
|
|
|
104
|
جمال الدين فضل الله احمد پير جمالي اردستاني
|
قرن نهم هجري
|
|
105
|
خواجه ناصرالدين عبيدالله احرار
|
|
|
106
|
عبدالله قطب (قطب محيي)
|
|
|
107
|
نور الدين عبدالرحمن جامي
|
|
|
108
|
بديعالدين يا رضيالدين عبدالغفور لاري
|
|
|
109
|
خواجه ابواسحق ختلاني
|
|
|
110
|
امير سيد شهابالدين عبدالله برزشآبادي
|
|
|
111
|
شيخ رشيدالدين محمد بيداوازي
|
|
|
112
|
شاه شيخ علي اسفرائني
|
|
|
113
|
شيخ غلامعلي نيشابوري
|
|
|
114
|
شيخ عمادالدين فضلالله مشهدي
|
|
|
115
|
شيخ تاجالدين حسين تبادكاني خوارزمي
|
|
|
116
|
درويش محمد كارندهي
|
|
|
117
|
شيخ حاتم زراوندي خراساني
|
|
|
118
|
شيخ محمد علي مؤذن سبزواري
|
|
|
119
|
شيخ نجيبالدين رضا تبريزي اصفهاني
|
|
|
120
|
سرمد كاشاني
|
|
|
121
|
ملامحمد صوفي مازندراني
|
|
|
122
|
درويش محمد صالح لبناني
|
|
|
123
|
قاضي اسد كاشاني
|
|
|
124
|
شيخ علينقي اصطهباناتي
|
|
|
125
|
سيد قطب الدين محمد نيريزي شيرازي
|
|
|
126
|
ملا محمد اسماعيل كامل خراساني
|
|
|
127
|
آقامحمد هاشم درويش شيرازي
|
|
|
128
|
سيد عبدالنبي شيرازي (سلطان المشايخ)
|
|
|
129
|
سيد ابوالقاسم شريفي شيرازي(آقا ميرزابابا)
|
|
|
130
|
ميرزا احمد عبدالحي مرتضي تبريزي(وحيدالولياء)
|
|
|
131
|
درويش حسينعلي اصفهاني(كابلي)
|
|
|
132
|
رونق عليشاه كرماني
|
|
|
133
|
نظامعلي كرماني
|
نيمه اول قرن سيزدهم هجري
|
|
134
|
حسينعلي شاه اصفهاني
|
قرن سيزدهم هجري
|
|
135
|
شيخ زاهد گيلاني(ثاني)
|
|
|
136
|
مشتاقعليشاه تريتي
|
|
|
137
|
مظفر عليشاه كرماني
|
|
|
138
|
فيضعليشاه طبسي
|
|
|
139
|
نورعليشاه اصفهاني
|
قرن سيزدهم هجري
|
|
140
|
ملاعبدالصمد همداني
|
|
|
141
|
حاج زينالعابدين شيرواني(مستعليشاه)
|
|
|
142
|
رحمت عليشاه
|
|
|
143
|
سعادت عليشاه«طاووس العرفا»
|
|
|
144
|
نور عليشاه گنابادي
|
|
|
145
|
شمسالعرفا تهراني
|
|
|
|||||||||||||||||||||||||||
|
در جهان تاريخ، اديان بصورت ايدئولوژي گروهها، گروههايي كه منافع گوناگون و گاه متضاد داشتهاند، در آمدهاند. هرگاه تقابل بين اين گروها تا حد تخاصم و تضاد ميرسيد، ايدئولوژيهاي مذكور نيز كاركردها متضاد ايفا ميكردند. شريعتي، در فلسفه، تاريخ دين را به دين شرك و دين توحيدي تقسيم كرده و آورده است؛ دين شرك در تاريخ به دو شكل حركت دارد: اول به شكل مستقيم خودش كه در تاريخ اديان ميبينيم يعني دين مهرهپرستي، بعد تابوپرستي]كذا فيالاصل[، بعد ماناپرستي، بعد ربالنوع پرستي، بعد چند خداپرستي، بعد ارواح پرستي، بعد به شكل خداپرستي. اين سلسله دين شرك است در اديان؛ اما اينها اشكال آشكار دين شرك است. دوم شكل پنهاني دين شرك است كه از همه خطرناكتر و موذيتر است و تز همه به بشريت و به حقيقت بيشتر آسيب رسانده است. اين شكل پنهاني دين شرك پنهان شدن در زير نقاب توحيد است. پيغمبران توحيد تا برميخاستند و در برابر شرك ميايستادند، شرك در برابرشان ميايستاده. اين پيغمبران اگر پيروز ميشدند و شرك را به زانو در ميآوردند، در آن صورت شرك در پوست خودش و پيروان و جانشينان و ادامهدهندگان آن به زندگاني پنهاني خودشان ادامه ميدادهاند. اين است كه ميبينيم بلعم با عور در برابر موسي و در برابر نهضت موسي از ميان ميرود، به صورت خاخامهاي دين موسي و به صورت فريسيان كه قاتل عيسي هستند، در ميآيند |
تعريف ارسطوره در يك فرهنگ واژگان، داستانهايي درباره خدايان است. اما يك خدا چيست؟ يك خدا، تجسم قدرتي برانگيزنده يا نظامي ارزشي است كه در زندگي بشر و كاينات عملكرد دارد - قدرتهاي جسم خود شما و طبيعت. ارسطوهها وجه استعاري توان بالقوه روحي در بشريتاند، و همان نيروهايي كه به زندگي ما روح ميبخشند، به زندگي جهان نيز جان ميبخشند. اما اسطورهها و خداياني وجود دارند كه با جوامعي خاص سر و كار دارند و خدايان حامي آن جامعهاند. به عبارت ديگر، دو سطح كاملاً متفاوت اسطورهشناسي وجود دارد. يكي آنكه شما را به طبيعتتان و دنياي طبيعي كه بخشي از آن هستيد مربوط ميكند؛ و ديگري آنكه اكيداً جامعهشناختي است، و شما را به جامعهاي خاص مرتبط ميكند. شما صرفاًً يك انسان طبيعي نيستيد، بلكه عضوي از يك گروه خاصايد. در تاريخ اسطورهشناسي اروپايي ميتوانيد كنش متقابل اين دو نظام را ببينيد. نظامهاي معطوف به اجتماع معمولاً به عشاير كوچنده تعلق دارند، و شخص ميتواند ياد بگيرد كه كانون گروه كجا است. اسطورهشناسي معطوف به طبيعت متعلق به جوامع كشاورزي است.
سنت كتاب مقدس، نوعي اسطورهشناسي معطوف به اجتماع است. اسطوره اساساً چهار كاركرد دارد.
· اولين كاركرد آن، نقش عرفاني است. در واقع درك شگفتي جهان و انسان، و تجربه حرمت در مقابل اين راز است، اسطوره، جهان را در مقابل بعد راز، و درك رازي كه زيربناي همه صورتها است ميگشايد. اگر آن را از دست بدهيد، فاقد اسطورهشناسي هستيد. اگر راز در خلال همه چيزها خود را متجلي ميكند، كيهان به يك تصوير مقدس تبديل ميشود. شما از طريق شرايط واقعي دنياي خودتان همواره مخاطب راز متعادل هستيد.
· كاركرد دوم آن بْعد كيهانشناختي است كه علم به آن ميپردازد- به شما نشان ميدهد كه شكل كيهان چگونه است، اما به شيوهاي نشان ميدهد كه راز باز هم بر جاي ميماند. امروز ما بر اين گمانيم كه دانشمندان همه پاسخها را در اختيار دارند. اما دانشمندان بزرگ به ما ميگويند،"خير، ما همه پاسخها را نميدانيم. ما ميتوانيم به شما بگوييم كه چگونه كار ميكند، اما نميتوانيم بگوييم چيست؟" وقتي كبريتي روشن ميكنيد شعلهاي كه پديد ميآيد چيست؟ ميدانيد با من از اكسيداسيون صحبت كنيد، اما اين مطلب چيزي به من نميگويد.
· كاركرد سوم، نقش جامعه شناختي است - حمايت كردن از يك نظم اجتماعي معين و اعتبار بخشيدن به آن در اينجا است كه اسطورهها در مكانهاي مختلف تفاوت زيادي با يكديگر دارند. ميتوانيد يك اسطورهشناسي كامل براي چند همسري، و يك اسطورهشناسي كامل براي تك همسري داشته باشيد. هر يك از آنها در جاي خود درست است. بستگي به آن دارد كه در كجا هستيد. آنچه در جهان ما غالب شده، اين كاركرد جامعهشناختي اسطوره است و ديگر عمرش هم به پايان رسيده است. ما يك چيز ميدانيم: خداي ما، خداي شما نيز هست. زمين نزد او ارزشمند است و آسيب رساندن به زمين، ناسزا گفتن به آفريننده آن است.
چون ما پارهاي از زمين هستيم شما نيز پارهاي از زمين هستيد. اين زمين براي ما ارزشمند است، براي شما نيز ارزشمند است. ما يك چيز ميدانيم: فقط يك خدا وجود دارد. هيچ انساني را خواه سرخپوست، خواه سفيدپوست نميتوان به انزوا راند. وانگهي، ما همه با هم برادريم.
-
اما انديشه كردن در ذات حق باطل است، نه بدان خاطر كه فكر ما كوتاه است و موضوع فكرت بلند. بلكه چون خداوند فرمود:
|
پيش آن خورشيد كو بس روشن است
در حقيقت هر دليلي رهزن است |
-
و هنگامي كه ديدگان را بر آسمان بلند كردم
در هر هنري پديدهاي خاص به عنوان مادّة خام براي آفرينش به كار گرفته ميشود. نقّاش از خطّ و رنگ بهره ميگيرد، و موسيقي دان به صوت هماهنگي ميبخشد، و پيكرتراش با خمير و گچ و سنگ و چوب به كار آفرينش ميپردازد. در رقص و باله از حركات اندام، و در تئاتر از بازيگري و تقليد استفاده ميشود، و در هنر سينما همة اين هنرها با هم به كار گرفته ميشود.
يكي از دانشمندان درباره فردوسي چنين ابراز عقيده كرده است: يكي از نيكبختيهاي مردم پارسي زبان آنست كه آزاد مردي در طوس بدنيا آيد بر فرهنگ مملكتش عشق بورزد و به نيروي زبان گشادهتر از زبان دقيقي و اسدي و با گلستان انديشههاي چون بهشت برينش آن كار بزرگ را بپايان رساند و يادگاري از خود باقي گذارد كه بر زبان و فرهنگ ما سايهاي خوش بيافكند.
فلسفه زندگي به فلسفه هايي اطلاق مي شود كه محور و مركز توجه خود را زندگي قرار داده اند. مشهورترين فيلسوفان زندگي در غرب عبارتند از نيچه، ديلياي و برگسون. فلسفه زندگي واكنشي است در برابر گرايش هايي كه به نفي زندگي مي پردازند يا زندگي را تابع امر ديگري قرار مي دهند. نفي زندگي را مي توان در گرايش هاي راهبانه يا زاهدانه اي يافت كه تبليغ دوري از دنيا و زندگي مي كنند و گوشه گيري و عزلت طلبي رهبانيت را ترويج مي نمايند. اين گرايش در مسيحيت قرون وسطي و برخي آيين هاي ديگر رواج داشته است. در دوران جديد و از قرون شانزده به بعد در غرب گرايش به دنيا و طبيعت جايگزين دنيا گريزي و رهبانيت و تزهد گذشته شده است. آيا در اين صورت زندگي اصالت پيدا كرده است؟ آيا توجه به آباداني جهان و تسلط بر طبيعت و پيدايش تكنولوژي و علم تكنولوژيك به مبناي اقبال به زندگي بوده است؟ به نظر مي رسد پاسخ اين سوال بايد مثبت باشد، زيرا بشر(غربي) دوره اي از دنيا گريزي و رهبانيت را طي كرده و اينك به دنيا و زندگي دنيوي روي آورده است، بنابراين «زندگي» اصالت پيدا كرده است. بر اين اساس بررسي انضمامي آنچه طي بيش از چهار قرن بر انسان رفته است، نشان مي دهد كه به رغم آنكه در دوره جديد دنيا گريزي و رهبانيت جاي خود را به توجه به دنيا و طلب تسلط بر آن داده است، باز آنچه همچنان «فدا» شده، از دست رفته و معناي خود را بازنيافته است، «زندگي» است. ديروز «زندگي» به نفع «آخرتي» ادعايي نفي مي شد و امروز «زندگي» در پاي تسلط و تكنيك و سرعت و اراده به قدرت، ذبح مي شود و اين تجربه اي است كه بشر غربي آن را از سرگذرانده است و مضرات آن را انسان هاي همه نقاط عالم به جان آزموده اند. دوره جديد با ظهور عقل عداد انديش يا محاسبه گر آغاز گرديد. عقلي كه در همه چيز به ديده كميت و قابليت محاسبه مي نگرد. عقل جديد عقل رياضي است و عالم را تبديل به توده اي قابل اندازه گيري مي كند. هر آنچه موجود است از ديدگاه اين عقل و علم مبتني بر آن (علم ابژكتيو) امر قابل محاسبه است. اين نگاه اين توفيق را براي بشر به بار آورد كه بر طبيعت مسلط شود، نيروهاي آن را رام كند و در اختيار خود در آورد، فاصله ها را بسيار كوتاه سازد، ا رزش افزوده بسيار زياد در توليد و صنعت ايجاد كند، سرعت هاي خارق العاده و سرسام آور را در ارتباطات ايجاد كند و جهان را به عصر صنعتي و فراصنعتي برساند. همه اين پيشرفت هاي شگرف حاصل همان عقل رياضي و عداد انديش يا كمّي نگر است، عقلي كه عقلي را فراتر از خود نمي بيند و خود را متكي به خويش و مكتفي بذات مي شمارد. اما در پس همه پيشرفت ها و توفيقها يك چيز گم شده و مي بايست گم شود و آن «معناي» زندگي است. معناي زندگي يا حقيقت زندگي از دست رفت. زيرا اگر اصل پيشرفت تكنولوژيك باشد و اگر همه ملاك ها منحصر به ارزشيابي آنچه قابل اندازه گيري است باشد، در پاسخ به اين سوال كه اين همه سرعت براي چه؟ چه پاسخي مي توان ارائه كرد؟ آيا معناي «خود زندگي» ديگر چيزي جز تكرار و تكرار و سرعت بيشتر براي سرعت بيشتر خواهد بود؟ اين وضعيت همان چيزي است كه برخي متفكران غرب از آن به نيست انگاري تعبير كرده اند. اين وضعيت امروزه منحصر به غرب نيست. حتي كشورهاي غير غربي بيشتر از كشورهاي غربي دچار مشكلات و مصائب وضعيت دوره جديد شده اند، بطوري كه در برخي جوامع شاهد هستيم كه آنها بدون برخورداري از مزاياي تكنولوژي جديد، به معايب و مضرات آن گرفتارند. عصر ما عصر تهي شدن زندگي از «معنا» است. در عصر نيست انگاري كنش پذير ناقص، چگونه مي توان به زندگي معنا بخشيد. براي اين پرسش با تأمل به «معناي زندگي»، شايد بتوان پاسخي يافت. زندگي چيست؟ آيا زندگي صرف تغذيه و رشد و توليد مثل است؟ آيا زندگي مدتي را در اين جهان به سركردن است؟ آن هم به هر قيمتي؟ آيا زندگي تلاش بي وقفه در بيشتر داشتن است؟ به نظر مي رسد پاسخ اين پرسش ها منفي است. زندگي را مي توان عين خلاقيت و شكوفايي دانست و خلاقيت با تكرار ناسازگار است. خلاقيت خلاف آمد عادت است. و اگر زندگي عين خلاقيت است، معناي زندگي با هنر و آفرينش هنري عجين است و لازمه آفرينش هنري نيز وجد و سرزندگي و از خود بيرون شوندگي است. با هنر، اخلاق و معنويت مي توان به زندگي معنا بخشيد